जानें आखिर चुनावी प्रक्रिया में 'NOTA' का विकल्प क्यों लाया गया

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नई दिल्ली: एसएसी-एसटी एक्ट (SC/ST Act) में केंद्र सरकार द्वारा संशोधन कर फिर से उसके मूल स्वरूप में किये जाने पर सवर्ण समुदाय के लोगों में नाराजगी दिख रही है. यही वजह है कि देश भर के सवर्ण संगठनों ने 6 सितंबर को भारत बंद का आह्वान किया था. एससी-एसटी एक्ट के विरोध में सवर्णों के बीच नाराजगी ऐसी है कि कई लोग ऐसे हैं जो इस बार नोटा का विकल्प चुनने की बात कर रहे हैं. उनका कहना है कि एसएसी-एसटी एक्ट को लेकर मोदी सरकार का रवैया भी कांग्रेस की तरह है, इसलिए उनके पास सिर्फ नोटा का ही विकल्प बचता है. तो चलिए जानते हैं कि आखिर नोटा क्या है और किस तरह से होता है नोटा का इस्तेमाल...

जानें आखिर चुनावी प्रक्रिया में 'NOTA' का विकल्प क्यों लाया गया

दरअसल, फर्ज कीजिए कि आपको किसी पार्टी का कोई उम्मीदवार पसंद न हो और आप उनमें से किसी को भी अपना वोट देना नहीं चाहते हैं तो फिर आप क्या करेंगे. इसलिए निर्वाचन आयोग ने ऐसी व्यवस्था की कि वोटिंग प्रणाली में एक ऐसा तंत्र विकसित किया जाए ताकि यह दर्ज हो सके कि कितने फीसदी लोगों ने किसी को भी वोट देना उचित नहीं समझा है. यानी अब चुनावों में आपके पास एक और विकल्प होता है कि आप इनमें से कोई नहीं का भी बटन दबा सकते हैं. यानी आपको इनमें से कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है. ईवीम मशीन में NONE OF THE ABOVE यानी NOTA का गुलाबी बटन होता है.

दरअसल, भारत निर्वाचन आयोग ने दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में इनमें से कोई नहीं अर्थात नोटा (None of the above, or NOTA ) बटन का विकल्प उपलब्ध कराने के निर्देश दिए. नोटा उम्मीदवारों को खारिज करने का एक विकल्प देता है. ऐसा नहीं है कि वोटों की गिनती की समय उनके वोटों को नहीं गिना जाता है. बल्कि नोटा में कितने लोगों ने वोट किया, इसका भी आकलन किया जाता है. चुनाव के माध्यम से पब्लिक का किसी भी उम्मीदवार के अपात्र, अविश्वसनीय और अयोग्य अथवा नापसन्द होने का यह मत केवल यह सन्देश मात्र होता है कि कितने प्रतिशत मतदाता किसी भी प्रत्याशी को नहीं चाहते हैं.

जब नोटा की व्यवस्था हमारे देश में नहीं थी, तब चुनाव में अगर किसी को लगता था कि उनके अनुसार कोई भी उम्मीदवार योग्य नहीं है, तो वह वोट नहीं करता था और इस तरह से उनका वोट जाया हो जाता था. ऐसे में मतदान के अधिकार से लोग वंचित हो जाते थे. यही वजह है कि नोटा के विकल्प पर गौर फरमाया गया ताकि चुनाव प्रक्रिया और राजनीति में शुचिता कायम हो सके. बता दें कि भारत, ग्रीस, युक्रेन, स्पेन, कोलंबिया और रूस समेत कई देशों में नोटा का विकल्प लागू है.

साल 2009 में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से नोटा का विकल्प उपलब्ध कराने संबंधी अपनी मंशा से अवगत कराया था. बाद में नागरिक अधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ ने भी नोटा के समर्थन में एक जनहित याचिका दायर की. जिस पर 2013 को न्यायालय ने मतदाताओं को नोटा का विकल्प देने का निर्णय किया था. हालांकि बाद में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि नोटा के मत गिने तो जाएंगे पर इसे रद्द मतों की श्रेणी में रखा जाएगा. इस तरह से स्पष्ट ही था कि इसका चुनाव के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

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