चूहे बेचते-बेचते बन गया वह 100 करोड़ की कंपनी का मालिक..!

आम तौर पर कंपनी के मालिक अपने कर्मचारियों को अपने यहां जिंदगी भर काम करने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन एक ऐसा व्यवसायी भी है जो अपने यहां काम करने वाले लोगों को हमेशा खुद का व्यवसाय करने की प्रेरणा देता रहता है। इसकी बड़ी वजह है उसका खुद इस बात को समझ जाना कि जो नौकरी की चूहा दौड़ में फंस जाता है, वो कभी इसके चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाता।

 चूहे बेचते-बेचते बन गया वह 100 करोड़ की कंपनी का मालिक..!

दरअसल, हर कंपनी को अच्छे कर्मचारियों की जरूरत होती है और ज्यादातर लोग अच्छे कर्मचारी के तौर पर ही अपने जीवन की इतिश्री करते हैं, लेकिन इस शख्स का मानना है कि अपने व्यवसाय को स्थापित करना न सिर्फ हर एक का अधिकार है बल्कि ये व्यवसायिक जीवन में उनकी पूर्णता का प्रमाण पत्र भी है।

जी हां, हम बात कर रहे हैं देश के एक उभरते हुए व्यवसायी के. पी. सिंह की जो स्टार्ट अप इंडिया और यंग इंडिया दोनों ही सपनों को साकार करते दिखते हैं। देश का युवा ऊंची उड़ान भरने के सपने तो देखता है, लेकिन वो सिर्फ ख्याली दुनिया में उलझ कर रह जाता है। ज्यादातर युवा किस्मत और हालात को कोसते दिखाई पड़ते हैं जबकि कुछ ऐसे होते हैं, जो सिर्फ और सिर्फ कामयाबी पर नजर रखते हैं और लगातार अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते चले जाते हैं। ऐसे ही युवा व्यवसायी के. पी. सिंह की अपने स्टार्ट अप आरोग्य मेडिकल की कहानी भी बहुत प्रेरणादायी है।

करोड़ों की कंपनी के मालिक बनने से पहले वो खुद भी अलग अलग कंपनियों में कर्मचारी के तौर पर काम करते रहे। वो नौकरी की उलझन और उसमें लगातार बनी रहने वाली असंतुष्टी से वाकिफ हैं, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने उन असीम संभावनाओं को भी खंगालने का काम किया, जो हम सबके के लिए समान रूप से मौजूद है। इन संभावनाओं को जानने के लिए जरूरत है एक तीव्र इच्छा की।

 चूहे बेचते-बेचते बन गया वह 100 करोड़ की कंपनी का मालिक..!

दरअसल, पेट्रोल पंप की नौकरी से लेकर ट्रांसपोर्ट के लिए काम करने वाले के. पी. सिंह का मानना है कि हम जो चाहते हैं वहीं पाते हैं। हममें से ज्यादातर युवा असुरक्षा के बारे में दिन रात सोचते रहते हैं और चाहते हैं सुरक्षा। अपनी आमदनी को सुरक्षित करना चाहते हैं, अपने रिश्तों को सुरक्षित करना चाहते हैं, अपने नाम को सुरक्षित करना चाहते हैं लेकिन कोई विजन नहीं होने की वजह से सुरक्षित रहने की ये कोशिश सिर्फ ख्याली बनकर रह जाती है और हम सुरक्षित होने के बजाय 24 घंटे सिर्फ असुरक्षा का चिंतन करते रहते हैं।

देखा जाए तो हमारे दिमाग में तमाम संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन दिशाहीन चिंतन की वजह से हम कभी सकारात्मक और फलदायी चिंतन के लिए इसका इस्तेमाल कर ही नहीं पाते हैं। एक बार यदि आप विचार की ताकत को समझ जाते हैं, तो फिर हर कामयाबी आपको बहुत छोटी लगने लगती है।

के. पी. सिंह की इन बातों को जानने से पहले उनके अब तक के व्यवसायिक जीवन पर भी नजर दौड़ाने की जरूरत है। अपने स्कूल जीवन से ही वो व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ जीवन के अलग-अलग पहलुओं को समझते रहे। उनके जीवन की एक घटना का जिक्र करते हुए वो कहते हैं कि बहुत छोटी उम्र में वो सफेद चूहों को हाट बाजारों में बेचने जाया करते थे। इस घटना का जिक्र इसीलिए जरूरी है क्‍योंकि व्यवसायिक सोच छोटी या बड़ी नहीं होती है। बाजार में जरूरत को पैदा कर अपने माल को बेचना एक अच्छे व्यवसायी की पहचान है। आज उनकी कंपनी 100 करोड़ के आंकड़े तक पहुंच चुकी है।

इस मुकाम तक पहुंचने वाले के. पी. सिंह ने अपने व्यावसायिक जीवन की सीढ़ियां बहुत छोटी उम्र से ही चढ़नी शुरू की और आज वो देश के कई युवाओं के सामने खुद के जीवन के एक आदर्श के तौर पर रखने में कामयाब हुए हैं।

स्कूल और कॉलेज की एजुकेशन को वो कभी गंभीरता से नहीं ले पाए। उनका मानना है कि किताबी शिक्षा जरूरी तो है, लेकिन यहां व्यवहारिक ज्ञान की बहुत कमी है। आपको दोनों शिक्षाओं के बीच एक सामंजस्य बनाने की जरूरत है। जीवन से बड़ी पाठशाला कोई दूसरी नहीं होती और यहां वहीं पढ़ सकता है, जो सीखने का जुनून रखता हो। सीखने की प्रक्रिया में सफलता और असफलता के कोई मायने नहीं होते। हर असफलता दरअसल छद्म रूप में एक सफलता ही होती है क्‍योंकि इससे आप आगे की राह को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं।

यकीनन, के. पी. सिंह एक युवा व्यवसायी हैं और बहुत छोटी उम्र में उन्होंने अपने व्यवसाय को इंदौर शहर से निकालकर मायानगरी मुंबई में स्थापित कर दिया है। आज देश के लगभग हर राज्य में उनकी मेडिकल चेन आरोग्य से जुड़ने के लिए व्यवसायी बेकरार हैं। आमतौर पर IIT और IIM से निकलने वाले छात्रों को सफलता के योग्य माना जाता है। फॉलोअप के इस अंक में भी जिन स्टार्टअप की कहानियों को रखा गया है उनमें ज्यादातर लोग ऐसे ही बड़े संस्थानों के छात्र रहे हैं। इन सबसे अलग के. पी. सिंह ने कॉलेज डिग्री से ज्यादा व्यवसाय की व्यवहारिक शिक्षा पर ध्यान दिया और ये शिक्षा उन्हें किसी संस्थान में नहीं मिली बल्कि अपने छोटे छोटे कामों को आगे बढ़ाने से ही हासिल हुई।

 चूहे बेचते-बेचते बन गया वह 100 करोड़ की कंपनी का मालिक..!

ऐसा नहीं है कि उन्हें अपने पहले ही प्रयास में कामयाबी मिल गई। के. पी. सिंह के पिता ट्रांसपोर्टर है और अपने पिता के काम को ही सबसे पहले उन्होंने बड़ा रूप देने की कोशिश की। ट्रक चालकों को रास्ते में आने वाली परेशानियों से निपटने लिए उन्होंने अपनी एक कंपनी बनाई जिसके दफ्तर देश के अलग-अलग हिस्सों में डालने की कोशिश की गई। संसाधनों और धन की कमी वजह से ये प्रोजेक्ट बहुत लंबा नहीं चल पाया और इसे उन्हें जल्द ही बंद करना पड़ा।

ये काम उन्होंने एक ऐसे समय पर शुरू किया जब वो कॉलेज में पढ़ाई कर ही रहे थे। उस वक्त वेबसाइट्स का प्रचलन नहीं था और ऐप के बारे में तो किसी ने सोचा तक नहीं था। निराश होने के बजाए उन्होंने इस अनुभव से ये सबक लिया कि काम ऐसा किया जाए, जिसमें पकड़ आपके हाथ में हो और आपको ज्यादा लोगों पर शुरुआती दौर में आश्रित न रहना पड़ा। इसके बाद सेनेटरी प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनियों के लिए उन्होंने मिट्टी सप्लाय करने के काम की शुरूआत की। इस काम में पैसा हाथों हाथ मिलता था, लेकिन खनन और ट्रांसपोर्टेशन के पॉलिसी के चलते इस काम को भी लंबे समय तक चला पाना आसान नहीं था। इस बीच के. पी. सिंह लगातार नए नए प्रयोग करते रहे।

दरअसल केपी का मानना है कि एक व्यवसायी के लिए असली पूंजी उसका दिमाग ही होती है। जब तक आपके पास आइडिया है तब तक संभावनाओं का कोई अंत नहीं है। मूल रूप से बिजनेस का जुनून आपके भीतर होना जरूरी है। अपने इसी जुनून के साथ उन्होंने सरकारी ठेकों का रुख किया। सरकारी ठेकों में भी जमकर मारामारी थी। पहले से जमे जमाए कामों में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा थी। उन्हें अपने पहले के अनुभवों से ये बात समझ में आ गई थी कि भेड़चाल में चलने के बजाए कोई नया काम करना होगा। रचनात्मकता और नवीनता ही आपको भीड़ में अलग खड़ा कर सकती है।

इस तरह उन्होंने इस पर विचार करना शुरू किया कि ऐसा क्या किया जाए जो अब तक किसी व्यवसायी ने न किया हो। इंदौर जैसे शहर किसी व्यवसाय को प्रायोगिक तौर पर शुरू करने के लिए सबसे बढ़िया माने जाते हैं। के. पी. सिंह इसे अपना सौभाग्य मानते हैं कि वो इसी शहर में व्यवसाय के दांव पेंच सीख रहे थे। उनका ध्यान शहर में लगे होर्डिंग्स की भरमार पर गया, लेकिन इस क्षेत्र में पहले से ही कई बड़ी खिलाड़ी मैदान में थे।

 चूहे बेचते-बेचते बन गया वह 100 करोड़ की कंपनी का मालिक..!

इस बीच उनका ध्यान उन विज्ञापनों पर भी गया जो कई कमर्शियल बिल्डिंग्स पर लगे रहते थे। दुकानों और संस्थानों के बाहर लगे इन विज्ञापनों के लिए किसी तरह के नियम या सरकारी हस्तक्षेप नहीं थे। होर्डिंग्स पर मिलने वाले धन का एक हिस्सा नगर निगम को मिलता था, लेकिन व्यवसायिक प्रतिष्ठानों पर लगने वाले विज्ञापनों पर किसी का ध्यान नहीं था। उन्होंने लंबी रिसर्च के बाद इन विज्ञापनों से होने वाली आय को लेकर अपना प्रेजेंटेशन सरकारी अधिकारियों के सामने रखा। उनका ये प्रस्ताव सभी ने हाथों-हाथ लिया, लेकिन अब भी चुनौती थी टेंडर के जरिए इस काम को हासिल करने की। अपनी रिसर्च के वजह से के. पी. सिंह मार्केट के कई बड़े खिलाड़ियों से इस मामले में आगे थे और उन्हें पूरा भरोसा था कि इस काम को जिस तरह से वो कर सकते हैं कोई और नहीं कर पाएगा। आखिरकार उनका टेंडर पास हो गया और यहां से उन्होंने शौर्यादित्य एडवरटाइजिंग की शुरुआत की।

और फिर देखते ही देखते उनकी कंपनी शहर की सबसे बड़ी विज्ञापन कंपनी के तौर पर सामने आ गई। अवैध तरीके से लगे होर्डिंग्स के बजाय उन्होंने व्यवस्थित होर्डिंग प्रणाली पर भी काम किया। बीआरटीएस कॉरीडोर जैसी महत्वाकांक्षी योजना के साथ उनकी कंपनी को जुड़ने का मौका मिला। इस पूरी प्रक्रिया में उन्होंने इन कामों के दौरान पेश आने वाली प्रतियोगिता को भी समझा और साथ ही साथ अपनी फाइनेंस की समझ को भी विकसित किया। उनका ये कारोबार इतना कामयाब हुआ कि बाजार में सालों से काम कर रहे व्यवसायियों ने भी उनकी प्रतिभा का लोहा मान लिया।

के. पी. सिंह कहते हैं कि आप कोल्हू के बैल की तरह यदि किसी एक ही योजना पर काम करते रहेंगे तो आप उससे आगे नहीं बढ़ पाएंगे। साथ ही बदलते वक्त के साथ सब कुछ बदलता है, यही वजह रही कि बाजार में पारंपरिक तरीके से काम करने वाले कई पुराने खिलाड़ी पूरी तरह से खत्म हो गए। ऐसे कई लोगों ने बाद में के. पी. सिहं के साथ जुड़कर काम करने की बात रखी और इनमें से कई लोग अब उनके लिए काम भी करते हैं। दूसरों को जब वो ये बात समझाते हैं तो खुद भी लगातार इसे अपने व्यवसाय में इस्तेमाल करते हैं। कॉमर्स के स्टूडेंट रहे के. पी. सिंह के दिमाग में एक और रचनात्मक आइडिया आया और उन्होंने मेडिकल के क्षेत्र में कदम रखने का मन बनाया। यहीं से शुरूआत हुई आरोग्य मेडिकल की।

आम तौर पर रोटी कपड़ा और मकान को मूलभूत जरूरतों के तौर पर देखा जाता है, लेकिन के. पी. सिंह को एहसास हुआ कि इन तीनों से भी ज्यादा जरूरी आज जो चीज दिखाई पड़ती है वो है दवाइयां। महंगी दवाईयों के की मार मरीजों को बीमारियों से ज्यादा तकलीफ देती है। उनके एक पत्रकार मित्र ने उन्हें आरोग्य मेडिकल के लिए एक पंच लाईऩ दी। दवा अब दर्द नहीं देगी। इसी मकसद के साथ उन्होंने रेडक्रॉस सोसायटी के साथ मिलकर आरोग्य मेडिकल की शुरूआत की। इस मेडिकल स्टोर चेन के जरिए उन्होंने डिसकांउटेट रेट्स पर दवाएं मुहैया करवाने की शुरुआत की।

दरअसल, दवाओं के बाजार में जबरदस्त कमीशन को समझने के बाद उन्हें समझ में आया कि आम आदमी पर दवाओं के जबरदस्त दामों का बोझ ज्यादा फायदे के लालच में डाला जाता है। उन्होंने अपने फायदे को बहुत कम करते हुए 25 से 75 फीसदी के डिसकाउंट पर इन दवाओं का विक्रय शुरू किया। आज पूरे देश में उनकी इस पहल की मांग की जा रही है। इंदौर और मध्य प्रदेश के कई शहरों में उन्हें देखते ही देखते कामयाबी मिल गई।


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मोनार्क टाइम्स । Monarch Times: चूहे बेचते-बेचते बन गया वह 100 करोड़ की कंपनी का मालिक..!
चूहे बेचते-बेचते बन गया वह 100 करोड़ की कंपनी का मालिक..!
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